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किसान आन्दोलन (Farmers Protest): कौन सही? सरकार या किसान? क्या हैं आपके विचार ?

दिल्ली की सड़कों पर लाखों लोग आंदोलन (#FarmerProtest) कर रहे हैं और ये पूरा तांडव मचा हुआ है 3 नए कृषि कानूनों (Farm Bills) को लेकर । सरकार का कहना है कि यह कानून 1 दिन में नहीं बने या गैर कानूनी रूप से लागू नहीं किए गए बल्कि 20 साल की कंसल्टेशन और संसद के दोनों सदनों से पास करा करके लाए गए हैं । ये कानून लागू होने के बाद पूरे देश के किसानों को और ज्यादा अधिकार प्रदान करेंगे ।

तीनों कृषि कानूनों पर फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने स्टे लगाया हुआ है…

किसानों का तर्क ये है कि इसे किसान यूनियनों के साथ चर्चा किए बिना लाया गया है और इसका लाभ किसानों से ज्यादा कॉरपोरेट्स को मिलने वाला है । इसकी वजह से किसानों की जमीन जा सकती है, एपीएमसी (APMC) मंडिया खत्म हो जाएंगी और एमएसपी (MSP) की गारंटी भी खत्म हो जाएगी ।

इसी गतिरोध को खत्म करने के लिए किसान यूनियनों और सरकार के बीच 11 दौर की बातचीत की गई है लेकिन इसका कोई समाधान निकलता हुआ नहीं दिखाई दे रहा है । किसान इन तीनों कानूनों को रद्द करने की मांग पर अड़े हैं वहीं सरकार इनमें जरूरी सुधारो को लागू करने की बात कर रही है ।

इन हालातों में देश का एक आम नागरिक; किसकी तरफ से खड़ा हो? इसका क्या समाधान निकल सकता है? को लेकर काफी किंकर्तव्यविमूढ़ स्थिति में है । इसीलिए इस पोस्ट में हम किसी भी पक्ष का समर्थन किए बिना यह चर्चा करने जा रहे हैं कि इसमें किसानों की क्या वाजिब समस्याएं रही हैं और इन पर सरकार ने क्या जवाब दिया है ताकि आप भी इस मुद्दे को अच्छे से समझ सके ।

तो चलिए शुरू करते हैं…

इन तीन कृषि कानूनों को लाने की क्यों पड़ी जरूरत?

पुराने कृषि कानूनों में ऐसी कौन सी समस्याएं थी जिसकी वजह से सरकार को नया कृषि कानून को लाना पड़ा?

पुराने सिस्टम में किसानों को पहले अपनी फसलों को बेचने के लिए सरकार द्वारा नियुक्त कमीशन एजेंट या आढ़तियों के पास जाना पड़ता है । यह आढती किसानों से फसलों को खरीद कर उसकी छटाई, पैकिंग, सफाई आदि करके आगे कॉरपोरेट्स को बेचते हैं । इसके लिए वो पूरी फसल की दाम पर 1.5 से 3% तक कमीशन चार्ज करते हैं । इसी वजह से इन्हें बिचौलिया भी कहा जाता है ।

सिर्फ पंजाब में ही 40000 से अधिक आढ़तिये  (Arhtiyas) हैं!

साथ ही साथ ये आढती जिस मंडी में खरीदी करते हैं उसे राज्य सरकारें Agriculture Produce Market Committee Act के अंतर्गत नियंत्रित करती हैं । इन मंडियों को एपीएमसी (APMC) मंडी बोला जाता है । इन मंडियों में होने वाले सभी ट्रेड के ऊपर एक मंडी टैक्स या फीस भी लगता है जो सीधे राज्य सरकार के खजाने में जाता है।

Mandi Tax in India

नया कृषि कानून इन्हीं बिचौलियों और मंडी टैक्स को हटाने की बात करता है ।

एपीएमसी (APMC) मंडियों में क्या दिक्कत है?

2019 तक इंडिया में 6630 मंडिया थी जिसमें एमएसपी (MSP) के साथ फसलों की खरीदी होती है । औसतन एपीएमसी मंडी 469 sq km की क्षेत्रफल में फैली होती है । और यह आमतौर पर गावों से काफी दूर भी होती हैं । ऐसे में छोटे और मझोले किसान इन मंडियों तक ना पहुंच कर अपनी फसलों को आसपास के बड़े किसानों या दलालों को ही कम कीमत पर बेच देते हैं । इससे उनको एमएसपी की सुविधा नहीं मिल पाती है । अगर कोई किसान मंडी तक पहुंच भी गया तो बिचौलिए लंबे इंतजार आदि का बहाना लगाकर उनकी फसलों को एमएसपी से कम दाम पर खरीद लेते हैं ।

Where do farmers sell their produce in India
Data Source: 2013, NSS 70th round – by Govt. of India

भारत में सिर्फ 6% किसानों को ही एमएसपी (MSP)का लाभ मिल पाता है जिनकी संख्या महज लगभग 2.5से 3 करोड़ के आसपास है…

अगर निष्कर्ष निकाले तो मूलतः दो समस्याएं निकल कर सामने आ रही हैं-

  1. एपीएमसी (APMC) मंडी छोटे किसानों की हितों की रक्षा नहीं कर पा रहीं हैं,
  2. आढ़तियों की कमीशन और मंडी टैक्स से फसलों के दाम बढ़ जा रहे हैं लेकिन किसानों को उसका लाभ नहीं मिल पा रहा है ।

इन्हीं सब समस्याओं को दूर करने के लिए सरकार 3 नए कृषि कानून को लेकर आई है ।

क्या है यह तीन नए कृषि कानून?

कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक, 2020 (The Farmers’ Produce Trade and Commerce (Promotion and Facilitation) Act, 2020)

इसमें सरकार कह रही है कि वह किसानों की उपज को बेचने के लिए विकल्प को बढ़ाना चाहती है । किसान इस कानून के जरिये अब एपीएमसी मंडियों के बाहर भी अपनी उपज को ऊंचे दामों पर बेच पाएंगे और निजी खरीदारों से बेहतर दाम प्राप्त कर पाएंगे । एपीएमसी से बाहर भी बेच पाने की अधिकार की वजह से किसानों को बिचौलियों (Middle Man) के कमीशन और मंडी टैक्स से मुक्ति मिल जाएगी जो कि पुराने सिस्टम में संभव नहीं था ।

कृषि (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा करार विधेयक, 2020 (The Farmers (Empowerment and Protection) Agreement on Price Assurance and Farm Services Act, 2020)

इस कानून के संदर्भ में सरकार का कहना है कि वह किसानों और निजी कंपनियों के बीच में समझौते वाली खेती का रास्ता खोल रही है । इसे सामान्य भाषा में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग कहते है ।

आवश्यक वस्तु संशोधन विधेयक, 2020 (The Essential Commodities (Amendment) Act, 2020)

इसमें अनाज, तिलहन, दलहन आदि के भंडारण सीमा को खत्म कर दिया गया है । सरकार का तर्क यह है कि इससे नए गोदाम और कोल्ड स्टोरेज चेन की संख्या तेजी से बढ़ेगी और कृषि क्षेत्र में भी बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण होगा ।

सुप्रीम कोर्ट ने भी इस कृषि कानूनों के विरोध में चल रहे आंदोलनों पर अपनी टिप्पणी दी है । सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “आंदोलन का अधिकार एक मौलिक अधिकार है ।  इस विवाद को बातचीत के आधार पर सुलझा लेना चाहिए ” । इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक 4 सदस्यों वाली कमेटी भी बनाई है और जब तक ये कमेटी इन कानूनों की समीक्षा नहीं कर लेती तब तक इन तीनों नए कृषि कानूनों पर अस्थाई रूप से रोक रहेगी।

क्या है किसानों की आपत्ति और सरकार ने क्या दिया है जवाब?

किसानों का तर्क है कि नए कृषि कानूनों की वजह से APMC मंडी खत्म हो जाएगी और MSP लाभ भी मिलना बंद हो जाएगा!

ये तर्क किसानों का एक डर मात्र है क्योंकि इन दिनों कानूनों में इसकी कोई चर्चा ही नहीं की गई है । लेकिन क्या यह डर पूरी तरह से गलत है, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता ।

आइए इस पर भी चर्चा करते हैं…

पुराने कृषि कानूनों के तहत, किसानों को अपनी फसलों को बेचने के लिए एपीएमसी मंडी जाना पड़ता है जहां उन्हें अपनी उपज के कुल रकम पर आढ़तियों को कमीशन और मंडी टैक्स भी भरना पड़ता है ।

लेकिन नए सिस्टम के आने के बाद एपीएमसी के समानांतर एक नई मंडी खड़ी हो जाएगी जहां किसानों से ना ही आढ़ती कमीशन लिया जाएगा और ना ही मंडी का कोई टैक्स । इससे APMC मंडियों में किसानों का आना कम हो सकता है ।

अगर 50% किसानों का आना भी कम हुआ तो भी एपीएमसी मंडी धीरे धीरे बंद हो सकती है क्योंकि इस मंडी का संचालन है राज्य सरकारें मंडी फीस की मदद से करती हैं । और जब यह एपीएमसी मंडी पूरी तरह से बंद हो जाएंगी तो नई मंडियां अपनी मोनोपोली शुरू कर सकती हैं । साथ ही साथ एपीएमसी मंडी में ही सिर्फ एमएसपी की सुरक्षा मिलती है अगर यह एपीएमसी मंडी खत्म हो गए तो एमएसपी भी खत्म हो जाएगा क्योंकि नए मंडियों में तो एमएसपी का कोई प्रावधान ही नहीं है ।

सरकार ने इस तर्क पर जवाब दिया है की एमएसपी बंद नहीं होगा और वह इसे लिखित में भी देने को तैयार है । सरकार यह भी बता रही है कि एपीएमसी मंडियों को आधुनिक बनाया जा रहा है जिससे छोटे किसान भी इसका लाभ ले सके और एपीएमसी मंडी खत्म होंगी या नहीं इसका अधिकार राज्य सरकारों के पास है । राज्य सरकारें मंडियों को भी रेगुलेट कर सकती हैं, उसके ट्रैक पर फीस लगा सकती हैं आदि । नया सिस्टम आने से पुरानी एपीएमसी मंडी खत्म हो जाएगी यह मात्र एक अफवाह है ।

बिहार में एपीएमसी मंडी को 2006 में ही खत्म कर दिया गया था ।

किसानों का दूसरा तर्क यह है कि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के तहत किसान बड़े व्यवसायियों के साथ डील साइन कर लेंगे और किसी भी तरह की आपातकालीन स्थिति (यथा फसल खराब हो जाना, फसल की क्वालिटी में कमी आदि) की स्थिति आ जाने पर यदि वह इस डील की शर्तों को पूरा नहीं कर पाते हैं तो कॉरपोरेट्स किसानों की जमीनों को हड़प लेंगे!

इस पर सरकार का कहना है कि इस मुद्दे पर कानून बनाते समय पूरा ध्यान रखा गया है और किसी भी स्थिति में किसानों की जमीन नहीं छीन सकती है । इसके लिए एंपावरमेंट एंड प्रोटेक्शन एक्ट (Empowerment and Protection Act) बनाया गया है जो किसानों की हितों की रक्षा करेगा और इसके सेक्शन 8 में ये लिखा है कि किसी भी कारण में किसानों के खेती की जमीन की बिक्री, लीज या नीलामी नहीं की जा सकती है ।

Empowerment and Protection Act 2020 Section 8

किसानों का तीसरा तर्क यह है कि किसी भी विवाद की स्थिति में किसान सिविल कोर्ट में नहीं जा सकता और इसका निपटारा सिर्फ SDM स्तर पर ही होगा जो बिल्कुल गलत है क्योंकि बड़े कॉरपोरेट्स SDM को प्रभावित कर सकते हैं और जांच में देरी हो सकती है!

सरकार ने किसानों के इस तर्क पर सहमति दी है और वह इसके लिए सिविल कोर्ट में अपील के अधिकार को जोड़ने की बातों को स्वीकार कर लिया है ।

इसके अलावा किसान कुछ और बातों पर भी आपत्ति दर्ज कर रहे हैं जिसमें से प्रमुख हैं-

  • इस कृषि कानून को बनाने से पहले किसान यूनियन से सलाह नहीं ली गई,
  • बिजली और पानी की सब्सिडी को भी सरकार खत्म कर देगी, और
  • पराली जलाने पर दंड का प्रावधान किया गया है जो गलत है ।

सरकार ने इन तर्कों पर जवाब दिया है कि इन कानूनों को सरकार ने 20 वर्षों के कंसल्टेशन के बाद ड्राफ्ट किया है, बिजली और पानी की सब्सिडी को खत्म नहीं किया जाएगा और सरकार पराली जलाने के मुद्दे पर विचार करने के लिए तैयार है ।


इस पोस्ट में हमने किसानों की मुख्य समस्याओं और उस पर सरकार के रिएक्शन के बारे में आपको जानकारी दी । अब आप इस पर निर्णय लीजिए कि आप इस मुद्दे को कैसे देखते हैं ।

अगर आप इस पोस्ट से सहमत नहीं हैं या आपको इस पोस्ट से कोई शिकायत है या आपके पास हमारे लिए कोई बहुमूल्य विचार या सुझाव है तो आप नीचे कमेंट बॉक्स में दे सकते हैं ।

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