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अनमोल काव्य संग्रह – कवि दिनेश सिंह सेंगर की कलम से

इस खंडहर को

इस खंडहर को क्यों, सजाने में लगे हो दोस्तों ।
आओ चलो खाली करें, इस कोठरी को दोस्तों।।

यातनाओं मैं यहां क्यों, जी रहे हैं आप सब।
ऐसे घुट घुट कर यहां, कब तक जिओगे दोस्तों।।

अब तक उजालों से यहां, डरता है देखो आदमी ।
कैसे रहेंगे यह अंधेरों में, बताओ दोस्तों।।

सब बने मुर्दे यहां, शमशान बनती बस्तियां ।
कोई नहीं चाहता बदलना, अब यहां पर दोस्तों।।

मेरे मन इस खंडहर में, क्या कोई इंसान है ।
होता अगर इंसान तो, कुछ बोलता वह दोस्तों।।

अब यहां पर और ज्यादा, ठहरना अच्छा नहीं
जल्दी निकलने का कोई, रास्ता तलाशो दोस्तों।।

राष्ट्रभाषा को सुदृढ़ करो, हिन्दी को वरो – कवि दिनेश सिंह सेंगर की कलम से

हाथ फैलाती है ज़िन्दगी

हर राह दिन के उजालों में, हाथ फैलाती है ज़िन्दगी।
रातों के अंधेरों में फुटपाथ पर, ही सो जाती है ज़िन्दगी।।

खाने को नहीं दाना, पीने को नहीं पानी।
दर-दर की ऐसी ठोकरें, खाती है ज़िन्दगी।।

तन पर नहीं है वसन, बस कचरों के ढेर से।
अपने तन वदन को, छिपाती है ज़िन्दगी।।

सिर पर नहीं है छत न कोई बिस्तर इन पर।
बस यूं ही खुले फुटपाथ पर, सो जाती है ज़िन्दगी।।

इस तरह दिन के उजालों व रातों के अंधेरों में।
भूखे पेट ही दिन रात, गुज़र जाती है ज़िन्दगी।।

कभी वेवश बिलखती चीखती एक रात आती है।
और गुमनामियों के अंधेरों में खो जाती है ज़िन्दगी।।

“मेरे मन” इनको देख कर यह एहसास हुआ मुझको।
एक पल में कितने रंग दिखा जाती हैं जिन्दगी।।

पाक़ होकर हम चले अपने घराने के लिए

“मेरे मन”अब क्या कहूं, जालिम ज़माने के लिए।
क्यों दुआ कोई करे इसको बचाने के लिए।।

आज सब ख़ामोश है क्या हो गया क्या हो गया।
सबके सब कातिल बने देखो जमाने के लिए।।

मेरी अर्थी को न कांधा वो लगाएं देखना।
पाक़ हो कर हम चले अपने घराने के लिए।।

दे न दे मुझको तू ज़न्नत ए ख़ुदा तुमसे दुआ।
सबके दिल में दे मुहब्बत इस ज़माने के लिए।।

 

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