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बांग्लादेश के आजादी की कहानी: 16 दिसंबर विजय दिवस

भारत के उत्तर में चीन, दक्षिण में श्रीलंका, पश्चिम में पाकिस्तान और पूर्व में बांग्लादेश यह आज की स्थिति है। लेकिन 1971 से पहले की भौगोलिक स्थिति कुछ और ही थी। क्या हुआ था ऐसा कि बांग्लादेश एक स्वतंत्र देश बना? आइए जानते हैं इस पूरी कहानी को!

बात है मार्च 1971 की, पाकिस्तान ने पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) पर हमला बोल दिया।लोग इस लड़ाई के डर से पूर्वी पाकिस्तान को छोड़ कर भारत के सीमा में घुसपैठ करना शुरू कर दिये। सिर्फ 7 महीने में ही एक करोड़ से भी ज्यादा शरणार्थी भारत में आ चुके थे। भारत पर बोझ बढ़ने लगा तो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इस समस्या को खत्म करने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन से मुलाकात की। लेकिन अमेरिका इस मुद्दे पर मदद के बजाय पाकिस्तान को ही और शह देने लगा। अब अमेरिका ने तो साथ दिया नहीं तब भारत ने इस युद्ध में खुद ही जाने का फैसला किया और सिर्फ 13 दिन की लड़ाई में ही पूर्वी पाकिस्तान को पश्चिमी पाकिस्तान से अलग कर एक नए देश बांग्लादेश का निर्माण कर दिया।

कैसे लिखी गयी पटकथा?

1947 में पाकिस्तान बनने के वक्त से ही पश्चिमी पाकिस्तान के लोगों का पाकिस्तान के राजनीति पर वर्चस्व रहा। लेकिन दिसंबर 1970 के नेशनल असेंबली चुनावों में राजनीति की विसात ही बदल गई। मुजीबुर्रहमान आवामी लीग के नेता थे और इस चुनाव में उनकी पार्टी को 313 सीटों वाली नेशनल असेंबली में से 169 सीटें मिली जिसे पश्चिमी पाकिस्तान के राजनीतिक दल पचा नहीं पाए।

फिर क्या था पश्चिमी पाकिस्तान ने पूर्वी हिस्से में बंगालियों का दमन करने के लिए हमला बोल दिया। संघर्ष शुरू हो गया, आजादी की लड़ाई लड़े जाने लगी और यह संघर्ष लगभग 9 महीनों तक चला। बुद्धिजीवियों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं, छात्रों, व्यापारियों और अन्य पेशेवरों पर पूरे पूर्वी इलाकों में कहर ढाए गए। इसका असर यह हुआ कि लोग पूर्वी पाकिस्तान को छोड़कर भारत में आना शुरू कर दिए। यह आंकड़ा अक्टूबर 1971 तक एक करोड़ को पार कर गया।

पाकिस्तानी तानाशाह याहया खान के निर्देश पर पाकिस्तानी जनरल ने मुजीबुर्रहमान को पश्चिमी पाकिस्तान की जेल में डाल दिया। राजनीतिक स्थिति बदल रही थी, भारत पर भी इसका दबाव बढ़ रहा था क्योंकि भारत के सीमावर्ती राज्यों में नागरिकों की खाद्य और अन्य जरूरतें पूरी नहीं हो पा रही थी। पाकिस्तान का यह वीभत्स नरसंहार पूरी दुनिया ने देखा लेकिन किसी भी देश ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया नहीं दिया। इतना ही नहीं,  तमाम इस्लामिक मुल्क तो खुले तौर याहया खान के समर्थन में आ गए।

भारत को पता था कि अगर वह इस युद्ध में कूदा तो उसे आर्थिक और राजनीतिक दोनों परिणामों को भुगतना होगा लेकिन इंदिरा गांधी ने तो संकल्प कर लिया था। देश के सारे राजनीतिक दल भी इंदिरा गांधी के साथ खड़े हुए। भारत ने एक कदम और बढ़ाकर सीमा पार से आ रहे शरणार्थियों को ना सिर्फ रोटी-कपड़ा दिया बल्कि उन्हें रहने को छत भी मुहैया करवाया।

3 दिसंबर 1971 को इंदिरा गांधी के कलकता जनसभा के दौरान पाकिस्तानी वायु सेना के विमानों ने भारतीय सीमा को लांघ कर पठानकोट, श्रीनगर, अमृतसर, जोधपुर, आगरा आदि सैन्य ठिकानों पर बम गिराने शुरू कर दिए। भारत ने भी मुंहतोड़ जवाब दिया। भारतीय सेना आगे बढ़ी और दोनों के बीच आमना-सामना हुआ और आखिर में 16 दिसंबर 1971 का वह दिन आया जब पाकिस्तान के पूर्वी बंगाल प्रांत के मार्शल लॉ एडमिनिस्ट्रेटर लेफ्टिनेंट जनरल नियाजी ने 93000 सैनिकों के साथ ढाका में भारतीय आर्मी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल अरोड़ा के समक्ष आत्मसमर्पण किया और बांग्लादेश को अलग स्वतंत्र देश घोषित किया गया।

कैसे मिली विजय?

युद्ध की चुनौतियां काफी बड़ी थी लेकिन हम झुके नहीं हम लड़ाई में गए और एक बहुत बड़ा जोखिम लिया। इंदिरा गांधी ने सेना से सलाह मशवरा किया। फील्ड मार्शल जनरल मानेकशॉ ने इसके लिए वक्त मांगा। सेना ने तैयारी की और मोर्चा संभाला। अमेरिका ने भी चाल चली।उसने अपना सातवां बेड़ा बंगाल की खाड़ी में तैनात कर दिया। हमें डराने की कोशिश भी हुई पर हमारी सेना ने इसकी परवाह नहीं की। मानेक शॉ के नेतृत्व में सेना हर वक्त लड़ाई के लिए तैयार थी। उस दौर में भी मानेकशॉ का ध्यान इसी पर रहता था कि हमें हर वक्त लड़ाई के लिए तैयार रहना है। हमारी सेना ने उम्दा ढंग से लड़ाई लड़ी, रणनीति अच्छी रही। हालांकि सैन्य खामियां थी लेकिन हमने सामरिक परिस्थिति का लाभ उठाया। इस युद्ध में करीब 3900 सैनिक शहीद हुए और करीब 9851 सैनिक घायल हुए पर हमने इस लड़ाई को अपने नाम किया।

 

 

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